पलायन ने लिया विकराल रूप नहीं रुक पा रहा पलायन - तोहिष भट्ट सांई कॉलेज देहरादून

उत्तराखंड के पहाड़ों से पलायन आज एक बड़ा और विकराल समस्या का रूप ले चुका है। गौरतलब है कि नए राज्य की संकल्पना उत्तराखंड राज्य  के सपने अलग राज्य की मांग में पलायन भी एक मुद्दा था, ताकि पलायन को रोका जा सके और रोजगार यहां के लोगों को मिल सके। आज पलायन का मुद्दा महज एक राजनीतिक मुद्दा नहीं रह गया है बल्कि अपनी सांस्कृतिक पहचान खोने के संकट से जुड़ा राष्ट्रीय मुद्दा बनता जा रहा है। पिछले कुछ वर्षों से चाहे स्थानीय पहाड़वासी हो या दूरदराज इलाकों में रहने वाले प्रवासी जन पलायन के अभीश्राप की पीड़ा झेलने के लिए विवश है।



आखिर इस भारी संख्या में हो रहे पलायन के लिए कौन जिम्मेदार है। सरकार को पलायन रोकने के लिए तमाम बुनियादी सुविधाओं से लैस कर कुछ तो सुगम बनाती। यहां खेत है लेकिन बीज नहीं, भवन है तो टीचर नहीं, पाइपलाइन है तो पानी कम, बिजली के खंबे है तो बिजली नहीं, ऐसा नहीं है कि पलायन इन 19 सालों की समस्या है काफी पहले से लोग रोजी-रोटी के लिए मैदानों का रुख करते हैं। उत्तराखंड में पड़ोसी राज्य हिमाचल प्रदेश भी एक उदाहरण है जिन्होंने अपनी उन चीजों में अपनी पहचान व समृद्धि का निर्माण किया है जिसका संबंध विशुद्ध पर्वतीयता से है, कृषि, बागवानी, पर्यटन, कला, पनबिजली आदि। क्या उत्तराखंड में यह संभव नहीं था आज गांव में बूढ़े अकेले छूट गए हैं गांव भूतिया हो गए हैं, खंडहर हो गए हैं इसकी जिम्मेदारी किस पर आती है । महात्मा गांधी ने कहा था कि भारत की आत्मा गांवों में बसती है लेकिन जब गांव ही नहीं रहेंगे तो उसकी आत्मा बियाबान में ही भटकेगी। अब सरकार गांव में विकास तो कर रही है सड़कें, बिजली, पानी, पर्यटन के आधार पर रोजगार के लिए होमस्टे आदि लेकिन जब पहाड़ में लोग ही नहीं रहेंगे यह विकास किस काम का। लगभग 7 सालों में 700 से ज्यादा गांव खाली हो चुके हैं 50% लोगों ने आजीविका  के लिए पलायन क्या है। अब दुबारा लोगों को पहाड़ों की तरफ बसाना सरकार के लिए काफी मुश्किल है क्योंकि कहीं ना कहीं सरकार ने इस तरफ ध्यान देने में काफी देर कर दी हैं।
              तोहिष भट्ट
      सांई कॉलेज देहरादून